Thursday, August 2, 2012

सिरहाने में बिखरी सपनों की तादीर
भरे मन में बसी ईक तस्वीर
तस्सवुर में जिनकी बीती हैं सदियाँ
यादों में उनके भटके हैं गलियां

आँखों तले दबी तपती चिंगारी
करवट बदलकर, होते रतजगे
तन्हाई में है जिनका सहारा
यादों में उनके जीवन गुजारा

फंसे ऊंगलियों में कच्चे से धागे
सहमी सी हिरनी भरती कुलांचे
टहनियों पे छाया ग़म का है साया
देखे बिना उन्हें मन ये भरमाया

हथेली में मसली कच्ची सी कलियाँ
थाली में पूजा की जलती दीपक
प्रभु के पहले थी जिनकी वंदना
ईस जग में उनके बिन, नहीं अब रहना

Sunday, July 8, 2012


अधलिखे कागजों से उड़ती स्याही
थोड़ी सी हाँ थी थोड़ी मनाही
दूरियों के दरमियाँ की ये कहानी 
है मेरे लफ़्ज़ों से तुझको सुनानी
              
आँखों में ओसों की बूंदों का साया
गालों पर गहरी घटा का था छाया
अधरों पर मुस्कान दिल में कसक थी 
मेरे सिवा ना किसी को खबर  थी

ताज़ी हवा के झोकों सा साथ
डूबते को मिला तेरा हाथ 
जीने का मकसद तुझसे मिला था
जिंदगी से मुझको ना कोई गिला था

Tuesday, March 20, 2012

धूमल सी शाम के सिरहाने
डूबते सूरज की अनमनी आँखों से
ईक हल्का सा दर्द उभरता है
तेरी चाहत में मेरा इश्क संवरता है

चांदनी की मीठी छाँव में

ओस के बूंदों की तलाश में
दिल मेरा ईक आश करता है
तेरी चाहत में मेरा इश्क संवरता है

जेठ की तपती आग में

होंठों पे छलकती प्यास में
दिल मेरा बकवास करता है
तेरी चाहत में मेरा इश्क संवरता है

सावन की तेज़ बौछार में

गरजते बादलों की आड़ में
दिल मेरा तुझे प्यार करता है
तेरी चाहत में मेरा इश्क संवरता है

पूस की ठिठुरती रात में

कोहरे के घने अंधकार में
दिल मेरा लाचार रहता है
तेरी चाहत में मेरा इश्क संवरता है

मौसम बदलने के इंतज़ार में

अकेले से हो ईस संसार में
दिल मेरा ये ईकरार करता है
तेरी चाहत में मेरा इश्क संवरता है

Thursday, March 15, 2012

अधखुली आँखों से
अनमने खयालों के
आईने की झलक से
शर्मा कर बेझिझक से

हमने अपने दिल में
तेरी यादों के
चंद लम्हों में
गुजारी रात दोपहर से

बेख़ौफ़ ज्वाला की
मंद आंचों में
धधकते हिय की
इश्क आशिकी से

Saturday, March 3, 2012

थम-थम कर
हौले-हौले
मंद-मंद सी
बहती बयार

अलसाये दोपहर
चलना ईक पहर
पेड़ों की छाँव
मेरा ये गाँव

खेत धान के
फूलों की कतार
कच्ची मुंडेर
उड़ते बटेर

लीपा आँगन
तुलसी का पौधा
पूजा की थाली
भोर मतवाली

छोटा सा पोखर
गोधुली की बेला
धूलों के बवंडर
दिल में समंदर

आम का बागीचा
लीची के पेड़
सियार की हूँक
बातें दो-टूक

वो मेरा गाँव
मेरी पहचान
दिल में बसी है
ऊसकी छाप

वो राहें वो गलियाँ
वो नाजुक सी कलियाँ
वो तूफाँ में तिनके
थे वक़्त वो भी गम के

खाली बर्तनों से खनकते
अनजाने भय से लरजते
बिन बरसात के गरजते
हर पहर काटा तड़पते

हर शख्स से परेशां
न जीना था आसाँ
गम का था वो तूफां
फिर भी जीने का था अरमां

गर्दिशों में डूब कर
ज़िन्दगी से ऊब कर
हो खुद से रूबरू की
फिर जीने की आरजू

मदहोश सी आँखें हैं
क्या सन्नाटे में सोचते हो
किस चीज़ की है तलाश
खाली कमरे में खोजते हो

दिल की नहीं दवा
हर किसी के पास
जब विस्तार न था
क्यूँ माँगा आकाश

तेरे सपने तेरे अपने
किस बात से घबराये
ग़मों को कर मज़बूत
कोई ख़ुशी ना छीन पाए