वो राहें वो गलियाँ
वो नाजुक सी कलियाँ
वो तूफाँ में तिनके
थे वक़्त वो भी गम के
खाली बर्तनों से खनकते
अनजाने भय से लरजते
बिन बरसात के गरजते
हर पहर काटा तड़पते
हर शख्स से परेशां
न जीना था आसाँ
गम का था वो तूफां
फिर भी जीने का था अरमां
गर्दिशों में डूब कर
ज़िन्दगी से ऊब कर
हो खुद से रूबरू की
फिर जीने की आरजू
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