मदहोश सी आँखें हैं
क्या सन्नाटे में सोचते हो
किस चीज़ की है तलाश
खाली कमरे में खोजते हो
दिल की नहीं दवा
हर किसी के पास
जब विस्तार न था
क्यूँ माँगा आकाश
तेरे सपने तेरे अपने
किस बात से घबराये
ग़मों को कर मज़बूत
कोई ख़ुशी ना छीन पाए
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