Tuesday, March 20, 2012

धूमल सी शाम के सिरहाने
डूबते सूरज की अनमनी आँखों से
ईक हल्का सा दर्द उभरता है
तेरी चाहत में मेरा इश्क संवरता है

चांदनी की मीठी छाँव में

ओस के बूंदों की तलाश में
दिल मेरा ईक आश करता है
तेरी चाहत में मेरा इश्क संवरता है

जेठ की तपती आग में

होंठों पे छलकती प्यास में
दिल मेरा बकवास करता है
तेरी चाहत में मेरा इश्क संवरता है

सावन की तेज़ बौछार में

गरजते बादलों की आड़ में
दिल मेरा तुझे प्यार करता है
तेरी चाहत में मेरा इश्क संवरता है

पूस की ठिठुरती रात में

कोहरे के घने अंधकार में
दिल मेरा लाचार रहता है
तेरी चाहत में मेरा इश्क संवरता है

मौसम बदलने के इंतज़ार में

अकेले से हो ईस संसार में
दिल मेरा ये ईकरार करता है
तेरी चाहत में मेरा इश्क संवरता है

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