Monday, February 20, 2012

झींगुरों की झनझनाहट
सन्नाटे की ईक आहट
उडते पंछी दूर कहीं
इस रात की सुबह नहीं

अतृप्त आत्माओं का शोर
होता नहीं यहाँ पर भोर
गिरकर सडती लाश यहीं
इस रात की सुबह नहीं

कसमसाती ज़िन्दगी
है नहीं ये बंदगी
जहन्नुम है यहीं
इस रात की सुबह नहीं

हर दामन लगे है दाग
हर दिल में छुपी है आग
जो गलत है, वो सही
इस रात की सुबह नहीं

मानवता के जो शिकारी
उन पर हमने जान वारी
कहता मैं बस अब यही
इस रात की सुबह नहीं

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